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CHETRA NAVRATRA 2026 | GHAT STHAPNA MUHURAT,VIDHI | RASHI ANUSAR NAVRATRA PRATHAM DIN PUJA VIDHI

By Pandit Mukesh Shastri on 18 March 2026

CHETRA NAVRATRA 2026 | GHAT STHAPNA MUHURAT,VIDHI | RASHI ANUSAR NAVRATRA PRATHAM DIN PUJA VIDHI

 दुर्गा उपासना का महापर्व चैत्र नवरात्र ,बसंत नवरात्रा पर्व  गुरुवार दिनाक 19 मार्च 2026 को बड़े ही दुर्लभ संयोग में प्रारम्भ हो रहे है |
गुरुवार दिनाँक 19 मार्च 2026 को प्रातः 06-53  तक चैत्र अमावस्या रहेगी तत्पश्चात शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ हो जायेगी
तो बसंत नवरात्री घट स्थापना गुरुवार दिनाँक 19 मार्च 2026 को  की जायेगी
उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में घट स्थापना होगी  
 श्री गौतम जयंती मनाई जायेगी
गुड़ी पड़वा मनाया जायेगा
रौद्र नाम नव संवत्सर 2083 प्रारम्भ हो जायेगा
वर्ष का राजा देव गुरु रहेंगे
मंत्री मंगल और सेनापति चंद्र रहेंगे
 
 चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में आने वाले इन नवरात्रों  को ‘बसंत नवरात्र’  कहा जाता है. नवरात्रे के नौ दिनों में माता के नौ रुपों की पूजा करने का विशेष विधि विधान है. साथ ही इन दिनों में जप-पाठ, व्रत- अनुष्ठान, यज्ञ-दानादि शुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुन्य फलों की प्राप्ति होती है.नवरात्र के इन प्रमुख नौ दिनों में जो लोग नियमित रूप से पूजा पाठ और व्रत का पालन करते हैं. माँ दुर्गा की कृपा से उन्हें सभी संकटो संकतो से मुक्ति मिलती है .इस समय में माँ दुर्गा की पूजा उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है एवं सभी संकटों को हरने वाली माँ ना सिर्फ निरोगी काया , बल्कि धन में वृद्धि एवं पारिवारिक शान्ति भी प्रदान करती है।व्यापारी को व्यापार लाभ के लिए, कर्मचारी को पदोन्नति के लिए, गृहस्थी को घर में सुख, शांति के लिए माँ दुर्गा की आराधना करनी चाहिए

आइये सबसे पहले जान लेते है इस बार बसंत नवरात्र में माता की सवारी क्या रहेगी ? और उसका देश विदेश ,आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा /

देवी पुराण के अनुसार नवरात्रि के पहले और आखिरी दिन से मां भगवती के आगमन और प्रस्थान वाहन का पता चलता है।अगर मां का आगमन रविवार और सोमवार को होता है, तो उनकी सवारी हाथी पर होती है। मंगलवार और शनिवार को नवरात्र शुरू होने से अश्व, गुरुवार और श़ुक्रवार को पालकी और बुधवार को मां नौका पर सवार होकर आती हैं।
तो दोस्तों इस बार दुर्गा उपासना का महापर्व बसंत नवरात्रा पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानि गुरुवार दिनाँक 19 मार्च 2026  के दिन से आरम्भ हो रहा है
और शुक्रवार दिनाँक 27 मार्च 2026 को नवरात्र समाप्त होंगे
शास्त्र कहते है की यदि नवरात्र का प्रारम्भ गुरुवार के दिन हो तो माता पालकी पर सवार होकर आती है
वहीं शुक्रवार के दिन नवरात्र समापन होने का अर्थ है कि माता हाथी के ऊपर सवार होकर प्रस्थान करती है
माता का पालकी में बैठ कर आगमन होना मध्यम फल प्रदान करता है |  
 देवी पुराण में पालकी को संघर्ष, अस्थिरता और चुनौतियों का प्रतीक बताया गया है।
 देश-समाज के लिए कुछ उतार-चढ़ाव वाले दिन रहेंगे
 प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है
देश-दुनिया को रोग शोक , महामारी , प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है |
राजनितिक उथल पुथल को बड़ा सकता है |
आतंकवादी घटनाओं में वृद्धि हो सकती है |
विश्व के अनेको देशो को गृह युद्ध का सामना करना पड़ सकता है,
व्यापार में मंदी, अर्थव्यवस्था में गिरावट की भी आशंका रहती है
किसी बड़े राजनैतिक व्यक्ति का निधन हो सकता है
सामान्य रूप से गृहस्थ व्यक्ति के जीवन उथल पुथल ,रोग,अशांति रह सकती है
माता का हाथी पर प्रस्थान करना समृद्धि, सौभाग्य, प्रचुर वर्षा, कृषि वृद्धि और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।
सकारात्मक बदलाव, आर्थिक मजबूती और सामाजिक संतुलन की दिशा में वृद्धि का प्रतीक माना जाता है
देश में उत्तम वर्षा का योग बनेगा

 तो आइये  अब यह जान लेते है की बसंत नवरात्रा में घट स्थापना और देवी पूजन का सबसे शुभ मुहूर्त कौनसा है....

 देवी पुराण मे नवरात्रा के दिन देवी का आवाहन , स्थापना और पूजन समय प्रातःकाल मे लिखा है  
 
गुरुवार दिनाँक 19 मार्च 2026 को चैत्र नवरात्र अंतर्गत घट स्थापना एवं देवी पूजन  के शुभ मुहूर्त निम्न प्रकार से रहेंगे

सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त -
प्रातः 06-57 मिनट से प्रातः 07-50 मिनट के मध्य घट स्थापना का शुभ एवं सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त रहेगा
इस समय के मध्य द्विस्वभाव युक्त लग्न रहेगा

चौघड़िया मुहूर्त -
पूर्वाह्न 11-04 मिनट से दोपहर 02-05 मिनट के मध्य चर - लाभ का चौघड़िया मुहूर्त रहेगा

अभिजीत मुहूर्त -
दोपहर 12-11 मिनट से दोपहर 12-59 मिनट के मध्य में अभिजीत मुहूर्त में घट स्थापना की जा सकती है |

 आप सभी दर्शक इसका ध्यान रखे लाभ उठाये |  


 आइये अब जान लेते  है की देवी पूजा मे घट स्थापना और पूजा किस तरह से की जाये .....

नवरात्रि के पहले दिन यानि प्रतिपदा तिथि पर घट स्थापना की जाती है
प्रतिपदा तिथि को सुबह जल्दी उठकर स्नान एवं नित्यकर्म से निवृत्त हों कर अपने पूजा स्थान पर सबसे पहले घट स्थापना करे ।
सर्वप्रथम  स्नान कर गाय के गोबर से पूजा स्थल का लेपन करें या गंगाजल मिले शुद्ध पानी से अपने पूजा घर की साफ़ सफाई करे.
अब आप पूर्वाभिमुख होकर किसी गर्म आसन पर बैठ कर घट स्थापना के लिए  पवित्र मिट्टी  से वेदी का निर्माण करें,
फिर उसमें जौ और सात प्रकार के अनाज – इन सबको को मिलाकर बोये ।
उसी वेदी के मध्य सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको विधि पूर्वक स्थापित कर दे .
इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है
"जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नमोस्तुते ".
इसी मंत्र जाप से साधक के परिवार को सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद प्राप्त होता है.
 कलश को भगवान श्री गणेश का प्रतिरुप माना गया है. इसलिये सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है.
कलश लेकर उसमे पूर्ण रूप से जल एवं गंगाजल भर दे
साथ में एक सुपारी , कुछ सिक्के, दूब, हल्दी की एक गांठ कलश मे डाल डालकर दे .
 अब आप कलश के मुख पर  एक नारियल जटा वाला  लेकर उसको को लाल वस्त्र/चुनरी से लपेट कलश के ऊपर रख दे.
नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है
।नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं,
जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है।
इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहे।
ध्यान रहे कि नारियल का मुख उस सिरे पर होता है, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है।
कलश के चारो तरफ पञ्च पल्लव अर्थात अशोक वृक्ष या आम के पाँच पत्ते लगा दे
..अब आप एक चोकी या बजोट पर लाल वस्त्र बीचा कर उस पर चावल यानि अक्षत से अष्टदल बनाकर उस पर माँ दुर्गा की, या आपके कुलदेवी की तस्वीर को स्थापित कर दे .
देवी प्रतिमा स्थापित करके उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा को स्थापित करे
और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी की प्रतिमा की स्थापना करे .
घट स्थापना के साथ अखंड दीपक की स्थापना भी की जाती है।
 पूजा के समय घी का दीपक जलाएं तथा उसका गंध, चावल, व फूल से पूजा करें।
सबसे पहले  देवी पूजा का संकल्प करे .
अब आप सबसे पहले भगवान गणेश  जी की पूजा करे.  उसके बाद श्री वरूण देव, षोडशमातृका ,नवग्रह,श्री विष्णु देव की ,भगवान श्री राम की ,भगवान हनुमान जी ,पितृ देवताओ की,प्रधान कलश देवता की  पूजा करे
चुंकि भगवान शंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है. अत: भगवान भोले नाथ की भी पूजा भी की जाती है.  
 उसके बाद देवी के प्रथम स्वरुप माँ शैलपुत्री का आवाहन करे  माँ शैलपुत्री की पंचोपचार , षोडश उपचार पूजा करे .
माता की प्रतिमा को एक ताम्र पात्र में गुलाब की पत्तियों के ऊपर स्थापित करे |
 माता की प्रतिमा को केसर मिश्रित कच्चे दूध से  ,पंचामृत से ,गंगाजल से ,अनार के फल के रस से  ,सुगन्धित इत्र के जल से ,गुलाब जल से ,केवड़ाजल से स्नान करवाए |
अभिषेक के पश्चात तत्पश्चात माता को  लाल वस्त्र पहनाएं इसके बाद माता को फूल, माला चढ़ाएं, माता को सिन्दूर, अन्य श्रृंगार की वस्तुएं भी अर्पित करनी चाहिए।
गौघृत का  दीप करें, चंदन की अगरबत्ती जलाएं, अबीर चढ़ाएं .
 पूजन के पश्चात माँ दुर्गा की अपने परिवार सहित आरती करे,पुष्पांजलि के लिए हाथ में पुष्प लेकर माँ मंत्रो का जाप करे -

 
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

 ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।

 या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

 या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

 या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

 या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

 या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः          

 या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

 या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

 इन मंत्रो के उच्चारण के साथ पुष्पो को माता रानी को अर्पण  कर दे  और अंत मे पूजा मे अनजाने मे हुई कोई ग़लती के लिए क्षमा प्रार्थना करे और उनसे शुभ आशीर्वाद प्राप्त करे ।
पूरे नौ दिन तक माँ दुर्गा की साधना करे.
मन्त्र जाप करे
प्रतिदिन श्री दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ  करने से सभी मनोकामना पूर्ण होती है .
संध्याकाळ मे  माता रानी को भोग लगा कर आरती करे ।
नवरात्र में मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान श्रीराम व हनुमान की अराधना भी फलदायी बताई गई है.
सुंदरकाण्ड, रामचरित मानस और अखण्ड रामायण से साधक को लाभ होता है.
शत्रु बाधा दूर होती है. मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.
नवरात्रों का व्रत करने वाले उपवासक को दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए.
मांस, मदिरा का त्याग करना चाहिए. इसके अतिरिक्त नवरात्रों में बाल कटवाना, नाखून काटना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिए.
ब्रह्मचार्य का पूर्णत: पालन करना चाहिए।
नवरात्र के दिनों मे प्रतिदिन नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए।  
नवरात्रि के दौरान कुमारी कन्याओं को भोजन कराने की भी परंपरा है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष से लेकर नौ वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती है।


नवरात्रे के नौ दिनों तक विधिवत उपवास करने के बाद  शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन उपवासों का समापन किया जाता है प्रत्येक उपवासक की यह जिज्ञासा रहती है, कि वह माता को भोग में क्या दें, की माता शीघ्र प्रसन्न हों. हिन्दूओं का कोई भी उपवास भोग, प्रसाद के बिना पूरा नहीं होता है. व्रत किसी भी उद्देश्य के लिये किया गया हों, उसमें देवी-देवताओं को भोग अवश्य लगाया जाता है. नवरात्रे के नौ दिनों में नौ देवियों को अलग- अलग भोग लगाया जाता है. आज मै आपको अपने मन वांछित फल की प्राप्ति के लिए नवरात्रा में माँ को तिथि के अनुसार दिए जाने भोग के बारे मे बता रहा हु जिनके करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होकर आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करती है......

"प्रथम नवरात्रि के दिन मां के चरणों में गाय का शुद्ध घी अर्पित करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। तथा शरीर निरोगी रहता है।

दूसरे नवरात्रि के दिन मां को शक्कर का भोग लगाएं व घर में सभी सदस्यों को दें। इससे आयु वृद्धि होती है।

तृतीय नवरात्रि के दिन दूध या दूध से बनी मिठाई खीर का भोग माँ को लगाकर ब्राह्मण को दान करें। इससे दुखों की मुक्ति होकर परम आनंद की प्राप्ति होती है।

मां दुर्गा को चौथी नवरात्रि के दिन मालपुए का भोग लगाएं। और मंदिर के ब्राह्मण को दान दें। जिससे बुद्धि का विकास होने के साथ-साथ निर्णय शक्ति बढ़ती है।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां को केले का नैवैद्य चढ़ाने से शरीर स्वस्थ रहता है।

छठवीं नवरात्रि के दिन मां को शहद का भोग लगाएं। जिससे आपके आकर्षण शक्त्ति में वृद्धि होगी।

सातवें नवरात्रि पर मां को गुड़ का नैवेद्य चढ़ाने व उसे ब्राह्मण को दान करने से शोक से मुक्ति मिलती है एवं आकस्मिक आने वाले संकटों से रक्षा भी होती है।

नवरात्रि के आठवें दिन माता रानी को नारियल का भोग लगाएं व नारियल का दान कर दें। इससे संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।

नवरात्रि की नवमी के दिन तिल का भोग लगाकर ब्राह्मण को दान दें। इससे मृत्यु भय से राहत मिलेगी। साथ ही अनहोनी होने की घटनाओं से बचाव भी होगा। "

आइये अब जान लेते है अपनी राशि अनुसार कैसे करे  नवरात्र के प्रथम दिवस मां शैलपुत्री की पूजा ?

मेष राशि
मां शैलपुत्री  का अभिषेक गाय के कच्चे दूध में शहद मिलाकर करे।
लाल रंग की चुनरी ,बिंदिया , चन्दन एवं फूल अर्पण करे  
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
 ॐ मधुमत्यै नमः मंत्र का जाप करे |
 
 
वृष राशि
मां शैलपुत्री का अभिषेक दही से करे ।
सफेद मोगरे के पुष्प का गजरा ,चुनरी एवं चांदी की बिछिया अर्पण करे |
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ गिरिजायै नमः मंत्र का जाप करे |
 
 
मिथुन राशि
मां शैलपुत्री  का अभिषेक गन्ने के रस से करे |
गुलाब के पुष्पों की माला ,मेहंदी हल्के हरे रंग की चुनरी ,लिपिस्टिक माता रानी को अर्पण करे |  
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ कामाक्ष्यै नमः मंत्र का जाप करे |
 
 
कर्क राशि
मां शैलपुत्री  का अभिषेक दूध में शक्कर मिलाकर करे |
मोगरे के पुष्पों की माला ,चुनरी एवं माता रानी के चरणों के लिए चांदी की छोटी पायजेब अर्पण करे |
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ कान्तायै नमः मन्त्र का जाप करे |
 

 सिंह राशि
मां शैलपुत्री का अभिषेक मधु अथवा गुड़ युक्त जल से करे |
कमल का पुष्प , लाल चन्दन ,गोल्डन रंग की चुनरी एवं बिंदिया अर्पण करे |
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ मदनसुन्दर्यै नमः मन्त्र का जाप करे |
 

 
कन्या राशि
मां शैलपुत्री  का अभिषेक आंवले के रस से करे |
शमी पत्र ,हरी ओढ़नी माँ को अर्पण करे।
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ मालिन्यै नमः मन्त्र का जाप करें।
 
 
तुला राशि
माँ शैलपुत्री  का अभिषेक  अंगूर के रस  से करे |
मोगरे के पुष्पों से बना गजरा, ऑफ चुनरी ,चांदी का नाक का कांटा अर्पण करे |
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ त्रिशक्त्यै नमः मंत्र का जाप करे |
 

 
वृश्चिक राशि
मां शैलपुत्री  का अभिषेक अनार के रस से करे |
लाल फूल, लाल चन्दन ,लाल चूनरी माँ को अर्पण करे |
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ महासिद्धयै नमः मंत्र का जाप करे |  
 
 
धनु राशि
मां शैलपुत्री  का अभिषेक दूध में हल्दी अथवा पीला चन्दन मिलाकर करे |
पीले पुष्प ,पीली बिंदिया,पीली चुनरी अर्पण करे |  
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ अंबिकायै नमः मन्त्र का जाप करे |
 

मकर राशि
मां शैलपुत्री  का अभिषेक मौसम के रस से ,केवड़े के इत्र से करे |
कमल का पुष्प,काजल,5 फ़ल अर्पण करे |
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ श्रियै नमः मंत्र का जाप करे |
 
 
कुम्भ राशि
मां शैलपुत्री का अभिषेक सुगन्धित तेल से करे |
गुलाब की माला, सिंदूर ,बिंदिया अर्पण करे |  
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ भद्रायै नमः मन्त्र का जाप करे |
 
 
मीन राशि
मां शैलपुत्री का अभिषेक केशर मिश्रित दूध से करे |
पीले पुष्प ,पीला चन्दन ,पीली ओढ़नी अर्पण करे |
भोग में पंचमेवा ,नैवैध ,फल,पान अर्पण करे  
ॐ गौर्यै नमः  मंत्र का जाप करे।

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